सही और गलत का फैसला
सही और गलत का फैसला: क्या सचमुच हम जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है?
जीवन की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक यह है कि हम हर घटना को तुरंत दो खानों में बाँट देते हैं—सही या गलत, अच्छा या बुरा, लाभ या हानि।
जब कुछ हमारी इच्छानुसार होता है, तो हम उसे ईश्वर की कृपा मान लेते हैं। लेकिन जब परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध जाती हैं, तो हम उसे दुर्भाग्य, अन्याय या बुरा समय कहकर स्वीकार कर लेते हैं।
किसी की नौकरी चली जाती है, व्यापार में नुकसान हो जाता है, कोई प्रिय व्यक्ति साथ छोड़ देता है, या कोई सपना टूट जाता है। उस क्षण हमें लगता है कि जीवन ने हमारे साथ बहुत बुरा किया है।
दूसरी ओर, यदि अचानक कोई अवसर मिल जाए, मनचाही नौकरी प्राप्त हो जाए, व्यापार बढ़ जाए, या कोई बड़ी सफलता हाथ लग जाए, तो हम कहते हैं कि हमारे साथ बहुत अच्छा हुआ।
यही जीवन के दो किनारे हैं, जिनके बीच अधिकांश लोग अपनी पूरी यात्रा करते हैं।
लेकिन क्या वास्तव में हम जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा?
हमारी दृष्टि की सीमा
समस्या घटना में नहीं है, समस्या हमारी दृष्टि में है।
मनुष्य वर्तमान क्षण को देखकर निर्णय करता है, जबकि जीवन का सत्य समय के लंबे प्रवाह में छिपा होता है।
जब कोई घटना हमारे अनुकूल नहीं होती, तब हमारा चेतन मन तुरंत उसे "बुरा" घोषित कर देता है। इसके बाद नकारात्मक विचारों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है।
हम बार-बार स्वयं से कहते हैं—
"मेरे साथ गलत हुआ।"
"अब कुछ अच्छा नहीं होगा।"
"मेरा भविष्य अंधकारमय है।"
धीरे-धीरे यही विचार हमारे अवचेतन मन तक पहुँच जाते हैं।
अवचेतन मन की अद्भुत शक्ति
आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि हमारा अवचेतन मन उन विचारों और मान्यताओं के अनुसार कार्य करता है जिन्हें हम बार-बार दोहराते हैं।
यदि कोई व्यक्ति लगातार स्वयं को असफल, दुर्भाग्यशाली और कमजोर मानता है, तो उसका अवचेतन मन उसी दिशा में उसके व्यवहार, निर्णय और दृष्टिकोण को ढालना शुरू कर देता है।
वह अवसरों को पहचान नहीं पाता।
वह नए प्रयासों से डरने लगता है।
उसकी ऊर्जा क्षीण होने लगती है।
धीरे-धीरे वह स्वयं अपने चारों ओर ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कर लेता है जो उसकी नकारात्मक मान्यताओं को और मजबूत कर दें।
मानो वह अपनी ही सोच का कैदी बन गया हो।
लेकिन इसके विपरीत, जब व्यक्ति आशा, विश्वास और सकारात्मक संभावनाओं से भरा होता है, तब उसका अवचेतन मन भी उसी दिशा में कार्य करता है।
वह अवसर देखता है।
वह नए प्रयोग करता है।
वह चुनौतियों को सीखने का माध्यम समझता है।
और धीरे-धीरे जीवन उसके सामने नए द्वार खोलने लगता है।
क्या हर बुरी घटना वास्तव में बुरी होती है?
यहीं से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है।
यदि कोई घटना हमारे लिए बुरी है, तो इसका निर्णय कौन कर रहा है?
हम?
या केवल हमारा सीमित अनुभव?
मान लीजिए आपकी नौकरी चली गई।
उस क्षण आपको लगा कि सब कुछ समाप्त हो गया।
लेकिन क्या यह संभव नहीं कि वही घटना आपको उस स्थान से बाहर निकाल रही हो जहाँ आप वर्षों से ठहर चुके थे?
क्या यह संभव नहीं कि वही घटना आपको किसी बड़े अवसर की ओर धकेल रही हो?
क्या यह संभव नहीं कि जिस रास्ते को आप सुरक्षित समझ रहे थे, उसी पर आगे कोई बड़ा संकट आपका इंतजार कर रहा हो?
और क्या यह भी संभव नहीं कि किसी उच्च चेतना, किसी अदृश्य व्यवस्था, किसी दिव्य योजना ने आपके जीवन की दिशा बदलने का निर्णय लिया हो?
हम नहीं जानते।
क्योंकि हम केवल वर्तमान देखते हैं।
लेकिन जीवन सम्पूर्ण चित्र देखता है।
ईश्वर की कृपा हमेशा सुख के रूप में नहीं आती
हम अक्सर मानते हैं कि ईश्वर की कृपा का अर्थ है—
धन मिलना।
सफलता मिलना।
प्रशंसा मिलना।
मनचाही परिस्थितियाँ मिलना।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा कई बार कठिनाइयों के रूप में आती है।
क्योंकि सुख हमें सुला देता है, जबकि संघर्ष हमें जगा देता है।
सुख में हम अक्सर वही बने रहते हैं जो हम हैं।
दुःख हमें बदलने पर मजबूर करता है।
सुख में हम अपनी सीमाओं को नहीं देखते।
कठिनाइयाँ हमें हमारी वास्तविक शक्ति से परिचित कराती हैं।
सुख में हम संसार को देखते हैं।
दुःख में हम स्वयं को देखना शुरू करते हैं।
इसलिए अनेक बार जो घटना हमें अभिशाप लगती है, वही भविष्य में वरदान सिद्ध होती है।
जब जीवन में बड़े झटके आते हैं, तब मस्तिष्क स्वयं को नए ढंग से पुनर्गठित करना शुरू करता है।
कई शोध बताते हैं कि जीवन के बड़े संकटों के बाद लोग अधिक परिपक्व, अधिक संवेदनशील, अधिक आत्मविश्वासी और अधिक जागरूक बनकर उभरते हैं।
चेतना की दृष्टि से
यदि हम चेतना की ऊँचाइयों से देखें, तो जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता।
हर घटना हमें कुछ सिखाने आती है।
हर व्यक्ति कोई संदेश लेकर आता है।
हर सफलता हमें विस्तार देती है।
हर असफलता हमें गहराई देती है।
और विस्तार तथा गहराई दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण करते हैं।
इसलिए जब अगली बार जीवन में कुछ ऐसा घटित हो जो आपकी इच्छाओं के विरुद्ध हो, तो तुरंत उसे बुरा मत कहिए।
कुछ समय रुकिए।
देखिए।
समझिए।
स्वीकार कीजिए।
हो सकता है कि जीवन अभी वह अध्याय लिख रहा हो जिसका अर्थ आपको कई वर्षों बाद समझ आए।
अंतिम सत्य
हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम जीवन के एक छोटे से दृश्य को देखकर पूरी कहानी का निर्णय कर देते हैं।
जबकि सत्य यह है कि हम कहानी का केवल एक पृष्ठ देख रहे होते हैं।
सही और गलत का अंतिम फैसला हमारे सीमित मन की क्षमता से कहीं बड़ा है।
इसलिए विश्वास रखिए।
यदि आज सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार नहीं हो रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ गलत हो रहा है।
हो सकता है कि जीवन आपको वहाँ ले जा रहा हो जहाँ आपकी कल्पना भी नहीं पहुँच सकती।
और हो सकता है कि जिसे आप आज अपना सबसे बड़ा दुर्भाग्य समझ रहे हैं, वही कल आपके जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद सिद्ध हो।
क्योंकि ईश्वर जब कृपा करता है, तो वह हमेशा हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं करता।
वह हमारी आवश्यकता के अनुसार करता है।
और आवश्यकता को हम नहीं, वह बेहतर जानता है।
"जब जीवन में कुछ अच्छा हो तो आनंदित रहो, और जब कुछ बुरा हो तो धैर्य रखो; क्योंकि दोनों ही स्थितियों में ईश्वर तुम्हारे लिए कार्य कर रहा होता है।"
धीरेन्द्र सिंह चौहान
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