"मैं का अस्तित्व"
जब कभी जीवन में कोई बड़ा या छोटा कार्य तुम्हारे हाथों संपन्न हो जाता है, और उसके परिणाम इतने अद्भुत निकलते हैं कि स्वयं तुम्हें भी विश्वास नहीं होता, तब एक बहुत सूक्ष्म घटना घटती है। यही वह क्षण है जहाँ से मनुष्य या तो परम ऊँचाइयों की ओर बढ़ सकता है, या फिर अपने ही बनाए हुए अहंकार के कारागार में कैद हो सकता है।
कल्पना करो, तुम्हारे किसी प्रयास ने ऐसा फल दिया कि चारों ओर तुम्हारी चर्चा होने लगी। लोग तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाने लगे। तुम्हारी सफलता के किस्से सुनाए जाने लगे। हर व्यक्ति कहने लगा—"यह तो केवल तुम ही कर सकते थे।"
धीरे-धीरे यह सब सुनते-सुनते तुम्हारे भीतर भी एक स्वर उठने लगता है—
"हाँ, मैंने किया है। यह मेरी बुद्धि थी, मेरी क्षमता थी, मेरा परिश्रम था। यदि मैं न होता तो यह संभव ही नहीं था।"
और यहीं से एक खतरनाक यात्रा प्रारंभ होती है।
क्योंकि उसी समय, उसी क्षण, तुम्हारे भीतर कहीं बहुत गहरे, एक और स्वर भी उठ रहा होता है। वह इतना धीमा होता है कि भीड़ के शोर में सुनाई नहीं देता। वह कहता है—
"ठहरो... क्या सचमुच तुमने किया है?"
"क्या तुम उतने ही समर्थ थे जितना आज स्वयं को मान रहे हो?"
"क्या तुम्हें याद नहीं, कितनी बार तुम डरे थे? कितनी बार तुम्हारा विश्वास डगमगाया था? कितनी बार तुम्हें स्वयं नहीं पता था कि आगे क्या करना है?"
लेकिन मन उस स्वर को सुनना नहीं चाहता।
क्योंकि अहंकार को प्रशंसा का नशा चढ़ चुका होता है।
अहंकार बड़ा चतुर है। वह तुम्हें कभी सत्य के निकट नहीं जाने देता। वह तुम्हें बार-बार यही विश्वास दिलाता है कि संसार में जो कुछ हुआ है, उसका केंद्र तुम हो।
और जितना तुम इस भ्रम को पोषित करते हो, उतना ही तुम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होते जाते हो।
ओशो कहते थे—
"अहंकार संसार का सबसे बड़ा नशा है। शराब का नशा कुछ घंटों में उतर जाता है, लेकिन अहंकार का नशा जन्मों-जन्मों तक बना रहता है।"
जब लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, तब सावधान हो जाना।
क्योंकि वही समय है जब तुम्हारा पतन भी शुरू हो सकता है।
लेकिन यदि उसी क्षण तुम रुक जाओ...
यदि तुम भीतर उठ रही उस मृदु आवाज़ को सुन लो...
यदि तुम ईमानदारी से स्वयं से पूछ लो—
"क्या वास्तव में यह सब मैं ही हूँ?"
तो एक नया द्वार खुलता है।
तुम्हें दिखने लगता है कि तुम तो केवल एक माध्यम थे।
जिस बुद्धि पर तुम गर्व कर रहे हो, वह भी तुम्हारी बनाई हुई नहीं है।
जिस श्वास से तुम जीवित हो, वह भी तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है।
जिस हृदय की धड़कनों के सहारे तुम खड़े हो, उन्हें भी तुम नहीं चला रहे।
जिस अवसर ने तुम्हें सफलता दी, उसे भी तुमने नहीं बनाया।
फिर यह "मैं" कहाँ है?
धीरे-धीरे तुम्हें अनुभव होने लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति तुम्हारे पीछे कार्य कर रही थी।
कोई करुणामयी चेतना तुम्हारा हाथ पकड़े हुए थी।
कोई ऐसी ऊर्जा थी जो तुम्हारी सीमाओं से कहीं बड़ी थी।
तुम तो केवल एक बाँसुरी थे...
संगीत किसी और का था।
तुम तो केवल एक दीपक थे...
प्रकाश किसी और का था।
तुम तो केवल एक लहर थे...
सागर किसी और का था।
और जिस दिन यह अनुभव तुम्हारे भीतर उतर जाता है, उसी दिन अहंकार की दीवार में पहली दरार पड़ती है।
वह "मैं" जो अब तक स्वयं को कर्ता समझ रहा था, पिघलने लगता है।
एक अद्भुत विनम्रता जन्म लेती है।
तुम्हारे भीतर कृतज्ञता का फूल खिलने लगता है।
तब तुम सफलता का श्रेय लेने की बजाय धन्यवाद देना सीखते हो।
तुम कहते हो—
"हे परमात्मा! जो हुआ, तेरी कृपा से हुआ।"
"मैं तो केवल एक माध्यम था।"
और यही वह क्षण है जहाँ से अध्यात्म की वास्तविक यात्रा शुरू होती है।
मंदिरों में जाने से अध्यात्म शुरू नहीं होता।
ग्रंथ पढ़ लेने से अध्यात्म शुरू नहीं होता।
अध्यात्म शुरू होता है उस दिन, जब तुम्हारा "मैं" पहली बार झुकता है।
जब तुम स्वीकार करते हो कि जीवन में कुछ ऐसा भी है जो तुम्हारी समझ से परे है।
कुछ ऐसा जो तुम्हारे प्रयासों को दिशा देता है।
कुछ ऐसा जो तुम्हारे अंधकार में दीपक बन जाता है।
तब तुम्हारे भीतर एक नई प्यास जन्म लेती है।
परमात्मा को जानने की प्यास।
सत्य को देखने की प्यास।
अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्यास।
और तब ऐसा लगता है मानो अस्तित्व तुम्हें बुला रहा हो।
मानो आकाश के पार से कोई पुकार रहा हो—
"अब तुम तैयार हो।"
"अब तुम्हारा अहंकार थोड़ा ढीला पड़ा है।"
"अब तुम्हारी आँखों पर पड़ा भ्रम का पर्दा थोड़ा हटने लगा है।"
याद रखो, परमात्मा तक पहुँचने में सबसे बड़ी बाधा पाप नहीं है, अज्ञान नहीं है, असफलता नहीं है।
सबसे बड़ी बाधा है—'मैं'।
और सबसे बड़ा सौभाग्य वह क्षण है जब मनुष्य पूरे हृदय से कह सके—
"मैं नहीं, तू।"
जिस दिन यह वाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि तुम्हारे अनुभव का सत्य बन जाएगा, उसी दिन तुम्हारे भीतर वह द्वार खुल जाएगा जहाँ से आनंद बहता है, शांति बहती है, प्रेम बहता है, और जहाँ पहली बार तुम्हें अपने और परमात्मा के बीच कोई दूरी दिखाई नहीं देगी।
तब ज्ञात होगा—
कर्ता मैं कभी था ही नहीं।
मैं तो केवल एक निमित्त था।
नृत्य मेरा दिखाई देता था, पर नर्तक कोई और था।
गीत मेरे होंठों से निकला था, पर गायक कोई और था।
और उसी "कोई और" का नाम है—परम चेतना, परमात्मा, अस्तित्व।
धीरेन्द्र सिंह चौहान
Comments
Post a Comment